अपने होटल के आठवें फ़्लोर की खिड़की से बाहर देखते हुए लगा… 15 सालों में ये शहर कितना बदल गया। सर्दियों में वो Massachusetts में सिर्फ़ बर्फ़ गिरती… जो कहते थे दिल्ली की सर्दी का अपना मज़ा है, वो सच कहते थे। विदेश की ठंड और देश की गरमाहट का कोई मुक़ाबला नहीं।
फिलाल तो बहुत नींद आ रही है, इतनी लंबी फ्लाइट हो गई है की कुछ भी काम नहीं कर रहा है । बिस्तर पर लेट कर नींद ही उड़ गई, फ़ोन बुक खोल कर देखी की इस बार तो कुछ दोस्तों से मिल कर ही जाऊँगा तो सोचा कैप्टेन साहब को फ़ोन करता हूँ।
गौरव - अब्बे साले तू इतनी सुबह क्यों फ़ोन कर रहा है? मैंने कहा - अब्बे सुबह कैसी, अभी तो रात के 9 बजे है । गौरव चौक गया - अरे 9 तो इंडिया में बजे है। मैं कहा, हाँ वही तो मैं कह रहा हूँ - मैं घर में हूँ दिल्ली में ।
गौरव की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा । हम दोनों तक़रीबन 1 घंटा बात की , जॉब की , ट्रैवल की, उसकी दो बेटियां है और उसने दोनों के बारे में बताया । मन में बार बार ख्याल आ रहा था की उससे पूछूँ की उसकी कोई खोज खबर पर बातों के बीच में मौक़ा ही नहीं मिल रहा था । इससे पहले में कुछ और बोल पता, गौरव ने ही पूछ लिया, इस ट्रिप पे किस किससे मिलने का इरादा है ?
बस इतना इशारा काफी था और मैंने पूछ लिया, उसकी कोई खोज खबर? कॉलेज के दोस्तों की ख़ास बात होती है की वह आपको अच्छे से जानते है । गौरव ने छूटते ही बोला, मैं तो इंतज़ार कर रहा था की तू कब पूछेगा, साले ।
मैं हस पड़ा, उसने बताया की इससी साल उसकी पोस्टिंग वापिस से दिल्ली में हुई है एंड वोह अभी अपने मम्मी पापा के पुराने घर में रह रही है । आंटी के गुजर जाने के बाद, अंकल तो भैया के पास ऑस्ट्रेलिया मूव हो गए, वोह अभी अकेली रहती है ।
मेरे मन में आया, अकेले क्यों रहती है, मोहित का क्या हुआ? मुझसे रुका नहीं गया, और पूछ लिया - मोहित का क्या हुआ? उसने बोला, उससी से पूछ लेना जब तू उससे फ़ोन करेगा?
मैंने हस्सा और उससे पूछा, की तुझे क्यों लगता है मैं उससे फ़ोन करूँगा? गौरव जोर के हस पड़ा और बोला, लगी 1000 की तू उससे ज़रूर फ़ोन करेगा? यह साला जुरारी बिल्कुल नहीं बदला 50 रुपए की शर्त अब 1000 रुपए की हो गई है ।
मैं चाहता तो उससे उसका नंबर ले सकता था पर पता नहीं क्यों मांगा नहीं, मेरी कांटेक्ट लिस्ट में उसका नंबर तो है पर वह ह्वाट्सऐप पे नहीं दिखता, क्या पता उसने ब्लॉक किया हो, पर उसके पास मेरा US का नंबर कैसे होगा?
यह सोचते सोचते कब नींद लग गई, पता नहीं लगा ।
सुबह 12 बजे रूम सर्विस की खटखटा से उठा, और भूक लग रही थी जोरों से… फाटक से फ़ोन उठाया रूम सर्विस ऑर्डर करने के लिए और साथ में मेनू देखने लगा, सभी एक एक चीज़ें थी दाल मखनी, बटर चिकेन, रोगन जोश - दिल्ली का खाना सोच कर ही खुश हुए जा रहा था कि नजर पड़ी अरहर की घर वाली दाल और जीरा राइस पे, उसका फेवराइट। बस वही ऑर्डर किया और सोच रहा था की उसको फ़ोन करूँ की नहीं । क्या बोलूँगा, वह क्या कहेगी कुछ समझ नहीं आ रहा था, गौरव ने मोहित के बारे में ऐसा क्यों कहा की उससे ही पूछ लेना - मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी, यह सोचते सोचते खाना आ गया। कुछ देर तक मैं खाने को देखता रहा, बिल्कुल वैसी दाल जैसी वह बनाया करती - उड़की भाषा में comfort food.
पहले निवाला खाते ही मेरी आँखें नम हो गई और मन किया उसको अभी फ़ोन कर लूँ एंड लैंडलाइन पर फ़ोन कर डाला। घंटी बजती रही किसीं ने फ़ोन नहीं उठाया । फिर एहसास हुआ 2 बजे कौन ही होगा फ़ोन पे, गौरव ने बताया था अंकल भी अब वहाँ नहीं रहते।
खाना ख़त्म करके थोड़ा नीचे घूम आया, घर में फ़ोन किया, माँ और पापा को फ़ोन किया तो उन्होंने अपनी नाराज़गी दिखायी की सीधा मेरठ क्यों नहीं आया, दिल्ली में और 5 दिन क्या काम है । माँ तो समझ नहीं सकती थी, पापा को बता दिया की गुड़गांव में कांफ्रेंस अटेंड करने ही आया हुआ सो उसकी तयारी करना और बाक़ी सहकर्मी के साथ पूरी प्रेजेंटेशन का काम है। वोह तो हर क़िस्सी को दो दिन पहले भेज दिया गया जिससे की सफ़र की थकान उतार सके इसलिए ठीक 6 दिन बाद घर जाऊँगा, पूरे 15 दिन के लिए । मम्मी को भी इस बार समझाने के आना है की मैं क्यों संगीता आंटी की रश्मि से शादी नहीं कर सकता ।
यह सब होते होते शाम हो गई, सोचा अब फोन करूँ - तक़रीबन 8 बजे होंगे, लगा कहीं खाना बना ना रही हो, फिर सोचा 9 बजे करता हूँ। ऐसे करते करते 11 बज दिए, बहुत देर तक सोचता रहा - क्या बोलूँगा, क्या पूछूँगा, वोह क्या कहेगी - दिमाग़ में सारे बेस्ट केस सिनेरियो कर चुका था, अब डेटा एनालिस्ट हूँ, इतना तो सोचना बनता था ।
पूरे एक दिन गवा दिया था और दिन ख़त्म होते हुए लग रहे थे, लास्ट टाइम जब मिकी की शादी में आया था, तब भी फ़ोन नहीं कर पाया था वह 20 दिन तो पता नहीं कहाँ चले गए थे यही सोचते सोचते की क्या कहूँगा, पर आज नहीं । अब तो फ़ोन करना ही है!
फ़ोन में 11:45 दिखा रहा था, मैं और वक्त जायर नहीं करना चाहता था, घंटी बाज गई, इतना टाइम क्यों लगा रही है उठाने में - पहले तो 1 बजे से पहले कभी नहीं सोती थी, अपना रात का FM शो खत्म करके।
फ़ोन उठा, आधी नींद में उसका हेलो सुना, आज भी वही आवाज़, सरल पर कड़क। मेरा हेलो सुनते ही वोह चुप हो गई।
इससे पहले वोह कुछ बोल पाती, मैंने ही कह दिया, “कैसी हो? मैं तुम्हारे शहर में हूँ… परसों ही आया जब एयरवेज़ खुला… गौरव से पता लगा कि तुम अब भी वहीं रहती हो और तुम्हारा नम्बर अब भी 60080 है…”
इतना सुनने के बाद भी वोह चुप ही थी, पता नहीं उसको अच्छा लगा है की बुरा । मुझे शायद कॉल नहीं करना चाइए था, उसको शायद बहुत बुरा लगा रहा है ।
उसने पूछा, “कैसे हो?” और मैं अपने आप को रोक नहीं पाया यह बोलने को “अभी भी तुमको याद करता हूँ…”
उसने कहा, “अच्छा किया याद किया… और…”
मैं - और, तो बस क्या… आजकल दाढ़ी बढ़ गई है और बाल भी पोनी बना रखे हैं बिल्कुल अर्जुन रामपाल की तरह…क्या आज भी तुम्हारा फेवराइट है?
यह सुन कर वह हस पड़ी, मैं ब्यान नहीं कर सकता की यह हस्सी मैं अपने जीवन में कितना मिस करता हूँ।
मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और बोल दिया “आज भी तुम्हारी हसी उतनी ही खूबसूरत है।”
उसने कहा, “हाँ, पर मेरे बाल तो अब सफ़ेद हो गए”
आज भी वह तुलना ही करती रहती है, उसको कब समझ आयेगा की वह मेरे लिए तब भी खास थी, और आज भी । जैसी दोस्ती उसने निभायी है और जो भी उसने किया है मैं उम्र भर के लिए उसका कर्जदार हूँ और रहूँगा ।
मैंने कहा, “क्या मैडम, आज भी तुलना करती हो?”
अब बारी उसकी थी, मुझे लगा woh शायद खुलने लगी है, एक दम तपाक से बोली, “15 साल अमरीका में रहने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ… वही के वही यूपी वाला अंदाज़ …”
उसकी इससी मासूमियत पे बहुत प्यार आता था, मैं ज़ोर से हँसा और बोला — शहर बदला है, दिल नहीं।
इतना बोलना था और मैंने अपने सिर पर हाथ मारा, क्यों मैंने ऐसा बोला और उसको असुविधा में यह असमंजस में डाल दिया। मैं हमेशा से ही जल्दी बोल कर सारी चीज़ें ख़राब कर देता हूँ । क्यों अपने आप को इसके सामने इतना असहाय पाता हूँ ।
जैसा मैंने सोचा वही हुआ, उसने बोला “अभी बहुत रात हो चुकी है, कल बात करते हैं… तुम मुझे अपना नम्बर दे दो… मैं तुम्हें व्हॉट्सऐप कर दूँगी…”
मैं ना यह रात, ना ही यह बात ख़त्म करना चाहता था, मैंने बात को सीधा मुद्दे पे ले आया, “मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ…”
मैं अपनी पूरी फ्लाइट में यही सोच रहा था की इस बार बिना इससे मिले नहीं जाऊँगा, मुझे इस बार अपने सवालों का जवाब चाइए, मोहित को क्या हुआ, आंटी के बाद उसकी ज़िंदगी इतनी कैसे बदल गई?
मुझे उसकी घभराट महसूस हुई, शायद मैंने एक बार फिर उसको असमंजस में डाल दिया था, मैं उसकी घबराहट सुन सकता था ।
उसने शायद उससी घबराहट से कहा, “कब?”
मैं शायद इससी मौके का इंतज़ार कर रहा था, मैं अपने आप को रोक नहीं पाया, इतनी उतसूकता मैंने बरसो बाद अपने अंदर महसूस की थी, मैंने झट से बोला “आज, अभी, इसी वक़्त…”
फ़ोन पे कुछ खटपट हुई, मैं उसके दिल की हलचल महसूस कर पा रहा था, मुझे पता था वह शायद कभी बोलेगी नहीं और ना ही मानेगी पर वह भी मुझसे मिलना चाहती है ।
मुझे पता लग गया था कि वह खिड़की से झकने गई है, मैं अभी उतना पागल हूँ जो उसके घर के नीचे आ कर - जोर जोर से उसका नाम पुकारता था।
मैं उसको और परेशान नहीं करना चाहता था, सो मैं हस पड़ा, और कहा, “नहीं, तुम्हारी खिड़की पर आना छोड़ दिया है अब मैंने।”
उसके बाद उसने जो कहा, शायद मैं वह सुनने के लिए आज भी त्यार नहीं हूँ, “छोड़ा तो तुमने पता नहीं क्या-क्या है…”
मेरे अंदर यह सुन कर एक अजीब से मायूसी छा गई, ऐसा लगा की दसवी के बोर्ड एग्जाम में मैं फेल हो गया ।
और फिर हम दोनों चुप हो गए, हमें बात करते करते 1 घंटे के करीब हो चुका था, और मेरे पास शब्द नहीं थे उससे कुछ पूछने को । मैंने शायद यह फ़ोन करके कुछ पुराने ज़ख्म उखेड़ दिए थे ।
थोड़ी देर यूँही खामोश रहे, मेरा मन में बस उससे मिलने की इच्छा थी, उसको देखने की, पूछने की कुछ बातें पर शायद वह अभी मुझसे मिलने के लिए तयार नहीं है ।
कुछ देर बाद उसने कहा, “अब हमें फ़ोन रख देना चाहिए… बहुत देर हो चुकी है…”
मैंने बोला — “हाँ, देर तो काफ़ी हो चुकी…” और मन में यह बात बोला कि शायद अब मेरे लौटने के भी सारे दरवाज़े बंद हो चुके है।
शायद मैं अब उसकी किताब का सूखा हुआ गुलाब हो चुका हूँ, जिसको आप फेकना नहीं चाहते पर आप उसको बार बार किताब खोल कर देखना भी नहीं चाहते। फिर किस्सी दिन, बुक शेल्फ पर धूल साफ़ करते समय, आपकी नजर उस किताब पर पड़ती है, आप बड़े भरी मन से वह किताब उठा कर उसको गुलाब को देखते हो, वोह गुलाब को कुछ पुरानी यादों में ले जाता है पर जैसे ही उसस माया जाल में अपने आपको फँसा महसूस करते हो, आप तुरत ही वह किताब बंद कर देते हो ।
मैं आज शायद वह किताब और गुलाब दोनों हूँ ।
येह सोच कर ही मैं अपने अंशु रोक नहीं पाया, लग रहा था की उसका भी वही हाल है । फिर बिना कुछ बोले हमने फ़ोन रख दिया, अब तो अलविदा कहना भी बेमानी लगता है।
उसकी आवाज़ ने मुझे 20 साल पहले ला दिया जब ऑडियोटोरियम में मैंने पहली बार उसकी आवाज़ सुनी थी। उसको शायद आज तक नहीं पता की कॉलेज के शुरू होने एक महीने में ही मैं उसको पसंद करने लगा था, पर उससे बात करना तो दूर, उसने तो मेरी तरफ़ कभी देखा भी नहीं था।
उससी की एक सहेली पूनम ने बताया था, की उसका इंजीनियरिंग में बॉय फ्रेंड है तो तब से उससे बात करने का कोई औचित्ये नहीं था ।
पर आज लग रहा है यह रात मुझे उसके साथ बिताए पूरे 5 साल की यादें ताज़ा कर जाएगी ।