Sunday, June 7, 2026

My prized possession :)

You know, adulthood hits people differently. It can be as big as taking a huge loan to buy a luxurious 4 BHK, or as small as buying your own groceries from a physical store instead of Blinkit.

Do you realise how OTT and e-commerce platforms have suddenly become verbs? “Let’s Amazon it.” “Oh, you forgot a toothbrush? Let me Blinkit it for you.” “Did you Google the maps before you left home?” These are now a part of our everyday communication. LOL, I am digressing! :-P


Anyway, coming back to what I was discussing… adulthood.


This struck me yesterday while I was chit-chatting with my in-laws. I have a habit of fidgeting with things, and I happened to be rolling my specs around and rotating the temples. Mom stopped me and said, “It will break, don’t do that.”


I proudly told her, “Nothing is going to happen. Do you know how old these IDEE specs are? I bought them in 2010. They have survived my brutal treatment for the last 16 years.” And then we moved on to discussing something else.


Later, in the wee hours of the night, while looking for my specs to watch TV, I suddenly remembered how Papa had taken me to one of the most famous optical stores in Panipat, Beauty Opticians, to help me buy a pair of glasses without nose pads because the ones on my old specs used to dig into my nose and hurt a lot.


Even though I was earning by then, there is a certain joy in spending your parents’ money that you can see reflected in their eyes, and I couldn’t take that away from Papa. Just kidding. Parents simply take care of you without even being asked.



A little background on Papa: while he is an incredibly patient person, he is a very impatient shopper. He is the kind of person who would never sift through hundreds of options. If he likes the first thing he sees, he buys it. For my wedding trousseau, he made me buy 20 suits from one shop in 2 hours (can you believe that?) For those who cannot relate with this - pls ask your wife, girl friend, mom or sister. You would know the grief (still)! 


And yet, in a store full of hundreds of frames, he patiently made me try on countless pairs.


Papa made sure I bought the best frame within budget. Heck, my otherwise conventional dad even let me buy one with red temples - lightweight and pretty stylish for that time. An IDEE frame for ₹1,800, with lenses costing extra. Even then, he didn’t haggle. He got me the best anti-glare lenses, and the entire pair came to around ₹3,500.


It became one of my most prized possessions because I had never owned anything like it before. I thought it was incredibly chic to have dual-shaded specs for everyday office wear.


Suddenly, an under confident , low-key office-goer became Andy from The Devil Wears Prada after Nigel gifted her all those fabulous clothes and I couldn’t have been more ecstatic.



After some time, the red temples chipped a little, so I got blue ones instead. And they are still with me, 16 years later.


Today, I own frames from Gucci, Bvlgari, Sam & Marshall, and Lenskart. But the one frame that has remained constant is my IDEE pair, and I wouldn’t trade it for the world.


Whenever my prescription changed, those were always the first frames to get new lenses.


I sleep in them. I leave them by my bedside. Sometimes they end up under my pillow. They have travelled with me through hundreds of late-night reading sessions and countless chapters of life.


And I will always go back to my IDEE specs because they were never just a pair of glasses.


They are a reminder that some things stay precious not because of what they cost, but because of who bought them for you. ❤️.  


Also.., adulthood is not always about taking loans, promotions, or buying expensive things. Sometimes it’s about looking at an old pair of specs and suddenly seeing your parents in them. 



Friday, May 15, 2026

Part 2 - 60080

 अपने होटल के आठवें फ़्लोर की खिड़की से बाहर देखते हुए लगा… 15 सालों में ये शहर कितना बदल गया। सर्दियों में वो Massachusetts में सिर्फ़ बर्फ़ गिरती… जो कहते थे दिल्ली की सर्दी का अपना मज़ा है, वो सच कहते थे। विदेश की ठंड और देश की गरमाहट का कोई मुक़ाबला नहीं।

फिलाल तो बहुत नींद आ रही है, इतनी लंबी फ्लाइट हो गई है की कुछ भी काम नहीं कर रहा है । बिस्तर पर लेट कर नींद ही उड़ गई, फ़ोन बुक खोल कर देखी की इस बार तो कुछ दोस्तों से मिल कर ही जाऊँगा तो सोचा कैप्टेन साहब को फ़ोन करता हूँ। 


गौरव - अब्बे साले तू इतनी सुबह क्यों फ़ोन कर रहा है? मैंने कहा - अब्बे सुबह कैसी, अभी तो रात के 9 बजे है  । गौरव चौक गया - अरे 9 तो इंडिया में बजे है। मैं कहा, हाँ वही तो मैं कह रहा हूँ - मैं घर में हूँ दिल्ली में । 

गौरव की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा । हम दोनों तक़रीबन 1 घंटा बात की , जॉब की , ट्रैवल की, उसकी दो बेटियां है और उसने दोनों के बारे में बताया । मन में बार बार ख्याल आ रहा था की उससे पूछूँ की उसकी कोई खोज खबर पर बातों के बीच में मौक़ा ही नहीं मिल रहा था । इससे पहले में कुछ और बोल पता, गौरव ने ही पूछ लिया, इस ट्रिप पे किस किससे मिलने का इरादा है ? 


बस इतना इशारा काफी था और मैंने पूछ लिया, उसकी कोई खोज खबर? कॉलेज के दोस्तों की ख़ास बात होती है की वह आपको अच्छे से जानते है । गौरव ने छूटते ही बोला, मैं तो इंतज़ार कर रहा था की तू कब पूछेगा, साले । 


मैं हस पड़ा, उसने बताया की इससी साल उसकी पोस्टिंग वापिस से दिल्ली में हुई है एंड वोह अभी अपने मम्मी पापा के पुराने घर में रह रही है । आंटी के गुजर जाने के बाद, अंकल तो भैया के पास ऑस्ट्रेलिया मूव हो गए, वोह अभी अकेली रहती है । 


मेरे मन में आया, अकेले क्यों रहती है, मोहित का क्या हुआ? मुझसे रुका नहीं गया, और पूछ लिया - मोहित का क्या हुआ? उसने बोला, उससी से पूछ लेना जब तू उससे फ़ोन करेगा? 


मैंने हस्सा और उससे पूछा, की तुझे क्यों लगता है मैं उससे फ़ोन करूँगा? गौरव जोर के हस पड़ा और बोला, लगी 1000 की तू उससे ज़रूर फ़ोन करेगा? यह साला जुरारी बिल्कुल नहीं बदला 50 रुपए की शर्त अब 1000 रुपए की हो गई है । 


मैं चाहता तो उससे उसका नंबर ले सकता था पर पता नहीं क्यों मांगा नहीं, मेरी कांटेक्ट लिस्ट में उसका नंबर तो है पर वह ह्वाट्सऐप पे नहीं दिखता, क्या पता उसने ब्लॉक किया हो, पर उसके पास मेरा US का नंबर कैसे होगा? 


यह सोचते सोचते कब नींद लग गई, पता नहीं लगा । 


सुबह 12 बजे रूम सर्विस की खटखटा से उठा, और भूक लग रही थी जोरों से… फाटक से फ़ोन उठाया रूम सर्विस ऑर्डर करने के लिए और साथ में मेनू देखने लगा, सभी एक एक चीज़ें थी दाल मखनी, बटर चिकेन, रोगन जोश - दिल्ली का खाना सोच कर ही खुश हुए जा रहा था कि नजर पड़ी अरहर की घर वाली दाल और जीरा राइस पे, उसका फेवराइट। बस वही ऑर्डर किया और सोच रहा था की उसको फ़ोन करूँ की नहीं । क्या बोलूँगा, वह क्या कहेगी कुछ समझ नहीं आ रहा था, गौरव ने मोहित के बारे में ऐसा क्यों कहा की उससे ही पूछ लेना - मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी, यह सोचते सोचते खाना आ गया। कुछ देर तक मैं खाने को देखता रहा, बिल्कुल वैसी दाल जैसी वह बनाया करती - उड़की भाषा में comfort food. 


पहले निवाला खाते ही मेरी आँखें नम हो गई और मन किया उसको अभी फ़ोन कर लूँ एंड लैंडलाइन पर फ़ोन कर डाला। घंटी बजती रही किसीं ने फ़ोन नहीं उठाया । फिर एहसास हुआ 2 बजे कौन ही होगा फ़ोन पे, गौरव ने बताया था अंकल भी अब वहाँ नहीं रहते। 


खाना ख़त्म करके थोड़ा नीचे घूम आया, घर में फ़ोन किया, माँ और पापा को फ़ोन किया तो उन्होंने अपनी नाराज़गी दिखायी की सीधा मेरठ क्यों नहीं आया, दिल्ली में और 5 दिन क्या काम है । माँ तो समझ नहीं सकती थी, पापा को बता दिया की गुड़गांव में कांफ्रेंस अटेंड करने ही आया हुआ सो उसकी तयारी करना और बाक़ी सहकर्मी के साथ पूरी प्रेजेंटेशन का काम है। वोह तो हर क़िस्सी को दो दिन पहले भेज दिया गया जिससे की सफ़र की थकान उतार सके इसलिए ठीक 6 दिन बाद घर जाऊँगा, पूरे 15 दिन के लिए । मम्मी को भी इस बार समझाने के आना है की मैं क्यों संगीता आंटी की रश्मि से शादी नहीं कर सकता । 


यह सब होते होते शाम हो गई, सोचा अब फोन करूँ - तक़रीबन 8 बजे होंगे, लगा कहीं खाना बना ना रही हो, फिर सोचा 9 बजे करता हूँ। ऐसे करते करते 11 बज दिए, बहुत देर तक सोचता रहा - क्या बोलूँगा, क्या पूछूँगा, वोह क्या कहेगी - दिमाग़ में सारे बेस्ट केस सिनेरियो कर चुका था, अब डेटा एनालिस्ट हूँ, इतना तो सोचना बनता था । 


पूरे एक दिन गवा दिया था और दिन ख़त्म होते हुए लग रहे थे, लास्ट टाइम जब मिकी की शादी में आया था, तब भी फ़ोन नहीं कर पाया था वह 20 दिन तो पता नहीं कहाँ चले गए थे यही सोचते सोचते की क्या कहूँगा, पर आज नहीं । अब तो फ़ोन करना ही है! 


फ़ोन में 11:45 दिखा रहा था, मैं और वक्त जायर नहीं करना चाहता था, घंटी बाज गई, इतना टाइम क्यों लगा रही है उठाने में - पहले तो 1 बजे से पहले कभी नहीं सोती थी, अपना रात का FM शो खत्म करके। 


फ़ोन उठा, आधी नींद में उसका हेलो सुना, आज भी वही आवाज़, सरल पर कड़क। मेरा हेलो सुनते ही वोह चुप हो गई। 


इससे पहले वोह कुछ बोल पाती, मैंने ही कह दिया, “कैसी हो? मैं तुम्हारे शहर में हूँ… परसों ही आया जब एयरवेज़ खुला… गौरव से पता लगा कि तुम अब भी वहीं रहती हो और तुम्हारा नम्बर अब भी 60080 है…”


इतना सुनने के बाद भी वोह चुप ही थी, पता नहीं उसको अच्छा लगा है की बुरा । मुझे शायद कॉल नहीं करना चाइए था, उसको शायद बहुत बुरा लगा रहा है । 


उसने पूछा, “कैसे हो?” और मैं अपने आप को रोक नहीं पाया यह बोलने को “अभी भी तुमको याद करता हूँ…”


उसने कहा, “अच्छा किया याद किया… और…”


मैं - और, तो बस क्या… आजकल दाढ़ी बढ़ गई है और बाल भी पोनी बना रखे हैं बिल्कुल अर्जुन रामपाल की तरह…क्या आज भी तुम्हारा फेवराइट है?


यह सुन कर वह हस पड़ी, मैं ब्यान नहीं कर सकता की यह हस्सी मैं अपने जीवन में कितना मिस करता हूँ। 


मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और बोल दिया “आज भी तुम्हारी हसी उतनी ही खूबसूरत है।”


उसने कहा, “हाँ, पर मेरे बाल तो अब सफ़ेद हो गए”


आज भी वह तुलना ही करती रहती है, उसको कब समझ आयेगा की वह मेरे लिए तब भी खास थी, और आज भी । जैसी दोस्ती उसने निभायी है और जो भी उसने किया है मैं उम्र भर के लिए उसका कर्जदार हूँ और रहूँगा ।


मैंने कहा, “क्या मैडम, आज भी तुलना करती हो?”


अब बारी उसकी थी, मुझे लगा woh शायद खुलने लगी है, एक दम तपाक से बोली, “15 साल अमरीका में रहने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ… वही के वही यूपी वाला अंदाज़ …”


उसकी इससी मासूमियत पे बहुत प्यार आता था, मैं ज़ोर से हँसा और बोला — शहर बदला है, दिल नहीं।


इतना बोलना था और मैंने अपने सिर पर हाथ मारा, क्यों मैंने ऐसा बोला और उसको असुविधा में यह असमंजस में डाल दिया। मैं हमेशा से ही जल्दी बोल कर सारी चीज़ें ख़राब कर देता हूँ । क्यों अपने आप को इसके सामने इतना असहाय पाता हूँ । 


जैसा मैंने सोचा वही हुआ, उसने बोला “अभी बहुत रात हो चुकी है, कल बात करते हैं… तुम मुझे अपना नम्बर दे दो… मैं तुम्हें व्हॉट्सऐप कर दूँगी…” 


मैं ना यह रात, ना ही यह बात ख़त्म करना चाहता था, मैंने बात को सीधा मुद्दे पे ले आया, “मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ…”


मैं अपनी पूरी फ्लाइट में यही सोच रहा था की इस बार बिना इससे मिले नहीं जाऊँगा, मुझे इस बार अपने सवालों का जवाब चाइए, मोहित को क्या हुआ, आंटी के बाद उसकी ज़िंदगी इतनी कैसे बदल गई? 


मुझे उसकी घभराट महसूस हुई, शायद मैंने एक बार फिर उसको असमंजस में डाल दिया था, मैं उसकी घबराहट सुन सकता था ।


उसने शायद उससी घबराहट से कहा, “कब?” 

मैं शायद  इससी मौके का इंतज़ार कर रहा था, मैं अपने आप को रोक नहीं पाया, इतनी उतसूकता मैंने बरसो बाद अपने अंदर महसूस की थी, मैंने झट से बोला “आज, अभी, इसी वक़्त…”


फ़ोन पे कुछ खटपट हुई, मैं उसके दिल की हलचल महसूस कर पा रहा था, मुझे पता था वह शायद कभी बोलेगी नहीं और ना ही मानेगी पर वह भी मुझसे मिलना चाहती है । 


मुझे पता लग गया था कि वह खिड़की से झकने गई है, मैं अभी उतना पागल हूँ जो उसके घर के नीचे आ कर - जोर जोर से उसका नाम पुकारता था। 


मैं उसको और परेशान नहीं करना चाहता था, सो मैं हस पड़ा, और कहा, “नहीं, तुम्हारी खिड़की पर आना छोड़ दिया है अब मैंने।” 


उसके बाद उसने जो कहा, शायद मैं वह सुनने के लिए आज भी त्यार नहीं हूँ, “छोड़ा तो तुमने पता नहीं क्या-क्या है…”


मेरे अंदर यह सुन कर एक अजीब से मायूसी छा गई, ऐसा लगा की दसवी के बोर्ड एग्जाम में मैं फेल हो गया । 


और फिर हम दोनों चुप हो गए, हमें बात करते करते 1 घंटे के करीब हो चुका था, और मेरे पास शब्द नहीं थे उससे कुछ पूछने को । मैंने शायद यह फ़ोन करके कुछ पुराने ज़ख्म उखेड़ दिए थे । 


थोड़ी देर यूँही खामोश रहे, मेरा मन में बस उससे मिलने की इच्छा थी, उसको देखने की, पूछने की कुछ बातें पर शायद वह अभी मुझसे मिलने के लिए तयार नहीं है ।


कुछ देर बाद उसने कहा, “अब हमें फ़ोन रख देना चाहिए… बहुत देर हो चुकी है…”


मैंने बोला — “हाँ, देर तो काफ़ी हो चुकी…” और मन में यह बात बोला कि शायद अब मेरे लौटने के भी सारे दरवाज़े बंद हो चुके है। 


शायद मैं अब उसकी किताब का सूखा हुआ गुलाब हो चुका हूँ, जिसको आप फेकना नहीं चाहते पर आप उसको बार बार किताब खोल कर देखना भी नहीं चाहते। फिर किस्सी दिन, बुक शेल्फ पर धूल साफ़ करते समय, आपकी नजर उस किताब पर पड़ती है, आप बड़े भरी मन से वह किताब उठा कर उसको गुलाब को देखते हो, वोह गुलाब को कुछ पुरानी यादों में ले जाता है पर जैसे ही उसस माया जाल में अपने आपको फँसा महसूस करते हो, आप तुरत ही वह किताब बंद कर देते हो ।


मैं आज शायद वह किताब और गुलाब दोनों हूँ ।


येह सोच कर ही मैं अपने अंशु रोक नहीं पाया, लग रहा था की उसका भी वही हाल है । फिर बिना कुछ बोले हमने फ़ोन रख दिया, अब तो अलविदा कहना भी बेमानी लगता है।


उसकी आवाज़ ने मुझे 20 साल पहले ला दिया जब ऑडियोटोरियम में मैंने पहली बार उसकी आवाज़ सुनी थी। उसको शायद आज तक नहीं पता की कॉलेज के शुरू होने एक महीने में ही मैं उसको पसंद करने लगा था, पर उससे बात करना तो दूर, उसने तो मेरी तरफ़ कभी देखा भी नहीं था। 


उससी की एक सहेली पूनम ने बताया था, की उसका इंजीनियरिंग में बॉय फ्रेंड है तो तब से उससे बात करने का कोई औचित्ये नहीं था ।


पर आज लग रहा है यह रात मुझे उसके साथ बिताए पूरे 5 साल की यादें ताज़ा कर जाएगी ।

Tuesday, May 12, 2026

Part 3 - college

कॉलेज का फर्स्ट सेमेस्टर आने को था और सब लोग जोर शोर से एग्ज़ाम्स की त्यारी कर रहे थे। मैं हमेशा की तरह मैं बेपरवाह सी कंप्यूटर लैब की सीढ़ियाँ चढ़ उतर रही थी। कभी इस ब्लॉक से यूएस ब्लॉक्स की क्लासेज करने को । 

इससी जल्दी में, कब मेरा दुपट्टा पैरों में फँसा और मैं उस कंप्यूटर लैब से, जो 2nd floor पर था … जहाँ से करीब 35-40 सीढ़ियाँ नीचे आती थीं… पूरे कॉलेज के बीचों-बीच लुढ़कती हुई पहुँच गई - पता ही नहीं चला। मेरी सारी सहेलियाँ हँस रही थीं, तभी एक हाथ आगे बढ़ा… उसने मुझे उठाया और पूछा, “Are you okay?”

मैं एकदम सन्न रह गई। इतना हैंडसम लड़का मुझसे बात कर रहा है - यह ही बहुत था… हाथ पकड़ना तो बहुत दूर की बात थी। कोई चोट नहीं लगी थी, बस पैर हल्की मोच आई थी । उसने मुझे सहारा दिया, अपने हाथों से उठाया और पास की बेंच पर बैठा दिया। फिर मेरी फ्रेंड्स की तरफ देखकर बोला, “Guys, she is really hurt.”

फिर क्या था… वह कभी कैंटीन में, कभी कॉरिडोर में, कभी क्लासेज के बाहर दिख जाता। कौन से ईयर में था, कौन सी स्ट्रीम में पढ़ता था — कुछ नहीं पता था। इतना अंडरकॉन्फ़ाइड थी कि उसका नाम तक ना उससे पूछ पाई, ना किसी और से।

बस इतना पता था कि जब भी आसपास होता… एहसास हो जाता। हमारी नज़रें मिलतीं और मैं तुरंत ऐसे मुँह फेर लेती जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो।

उस वक़्त मैं बिल्कुल साधारण सी रहती थी। आज के ज़माने में शायद उस वाली Garima को “behanji” बोल देते। मेक अप के नाम पर आँखों में काजल, एक लिप  बाम जिसे थोड़ा ब्लश की तरह इस्तेमाल कर लिया… सूट पहनती थी, दुपट्टा लेकर… और फ्लैट्स चप्पल। वैसे भी इतना गिरने का रिकॉर्ड था कि माँ पापा  ने हील्स पहनने से सख़्त मना किया हुआ था।

एक दिन ऑटो में बैठकर जब मैं घर लौट रही थी, उसने भी ऑटो रुकवाया और आकर मेरे साथ बैठ गया। इस रूट पर उसे पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए बड़ा अजीब लगा… और दिल की धड़कन तो जैसे कंट्रोल से बाहर थी।

बॉलीवुड का कीड़ा तो था ही… मुझे पूरा यक़ीन था कि अब वह बोलेगा — “मुझे तुम्हारी दोस्त Kalpana पसंद है… क्या तुम उसके लिए यह चिट्टी दे दोगी?” या “मेरी उससे बात करवा दोगी?”

ऐसे कम से कम हज़ार Permutation and Combination बना चुकी थी मैं। आखिर मैथ्स टॉपर जो थी।

थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद उसने कहा, “Hi, Garima.”

मैं चौंक पड़ी। उसे मेरा नाम पता है?

मैंने कहा, “Oh… hii?” — जैसे सवाल पूछ रही हूँ।

उसे समझ आ गया कि आज तक हमारा प्राइपर इंट्रोडक्शन हुआ ही नहीं था।

उसने हाथ बढ़ाते हुए कहा, “Hi, I am Raunak.”

मैंने भी पूरी जोश के साथ ज़ोर से हैंडशेक कर लिया। वह हँस पड़ा और बोला, “Manly handshake.”

और मैं वहीं सफेद पड़ गई।

इस छोटे से इंट्रो के बाद उसने कहा, “I need your help.”

बस… अब मुझे समझ आ गया था कि मुझसे बात क्यों हो रही है। मैंने तुरंत मुँह बना लिया।

वह हँसकर बोला, “अरे ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे बस आपके Differential Equations के नोट्स चाहिए। RK सर कह रहे थे कि अगर सबसे अच्छे नोट्स कोई  बनाता है तो वो Garima है। कई दिनों से सोच रहा था आपसे कैसे मिलूँ।”

फिर बोला, “Actually I’m preparing for GMAT… तो जितनी मदद मिल जाए।”

मैंने लंबी सी राहत की साँस ली।
Kalpana तो इसके ख़याल में भी नहीं है। यह तो सच में  पढ़ाकू निकला।

मेरा इम्प्रैशन लेवल अब 100 के पार था।

Looks — 10/10, Name — 20/10 or पढ़ाई वाला लड़का — 100/10

इससे पहले कि वह मेरी दिल की धड़कन सुन लेता, मैंने जल्दी से कहा, “कल ले आऊँगी… आप कॉलेज के गेट पर 12 बजे ले लेना, नहीं तो गार्ड भैया को दे दूँगी।”

वह मुस्कुराया और बोला, “आप पोस्ट क्यों नहीं कर देतीं? हम कॉलेज के बाद साथ वाले CCD में मिल सकते हैं… वहीं दे दीजिएगा। अगर आपके घर में कोई प्रॉव्लम  नहीं है।”

अब मैं कोई दकियानूसी सोच वाले घर से तो थी नहीं। मेरे पैरेंट्स की खुद 80s में लव मैरिज हुई थी।

अगले दिन मैं क्लासेज खत्म करके ठीक 3 बजे CCD पहुँच गई।

मैंने अपना फेवरेट पीला चिकनकारी सूट पहना था, साथ में सफेद चूड़ीदारी और सफेद दुपट्टा । आज थोड़ा अच्छा लगने के लिए झुमके और छोटी सी बिंदी भी लगा ली थी। सुबह तैयार होते वक़्त माँ बार-बार पूछ रही थीं, “आज क्या खास है?”

और मैं बस यही बोल रही थी, “अरे यार, इंसान अच्छे से तैयार भी नहीं हो सकता क्या?”

सुबह से दोपहर तक खुद को हज़ार बार देख चुकी थी। जहाँ भी कोई रिफ़्लेक्शिय दिख जाता — चाहे ऑटो का शीशा हो, गार्ड रूम का दीवार का शीशा जिसमें गार्ड भैया  बाल बनाते थे… चाहे क्लासरूम्स की खिड़कियां… जहाँ-जहाँ भी रिफ़्लेक्शन पड़ रही थी… साइंस के हिसाब से वहाँ तक पहुँचने वाली रोशनी मेरी ही थी।

किसी के आने से पहले कभी एहसास नहीं हुआ था कि किसी की मौजूदगी भी शोर कर सकती है।

ठीक पाँच मिनट बाद — Raunak।
वाइट शर्ट, ब्लू जीन्स, ब्लू कैनवास शूज़, टक्ड इन शर्ट, सिल्वर चैन वॉच एंड ओल्ड स्पाइस जैसी ख़ुश्बू ।

वह जहाँ खड़ा होता था, वहाँ बाकी आवाज़ें धीमी लगने लगती थीं।
वह भीड़ में अलग दिखने की कोशिश नहीं करता था… फिर भी सबसे अलग लगता था।

उसमें ऐसी कोई एक्स्ट्राऑर्डिनरी बात नहीं थी कि फुटबॉल टीम कैप्टेन हो या डिबेट चैंपियन । बिल्कुल नार्मल लड़का था। 80-90% वाला। उसने भी मेरी तरह हर चीज़ में एनरोल किया हुआ था — computer basics, Java, dramatics, cultural team…

उसे भी नेता बनने का शौक नहीं था… लेकिन जब वह बोलता था, स्टूडेंट्स क्या, टीचर्स  भी उसकी बात सुनते थे।

अब वह सामने आकर बैठ गया। उससे नज़र मिलाना आसान नहीं था… और नज़र हटाना उससे भी मुश्किल।

बात करते-करते वह अपने बाई हाथ से दाई हाथ की रिंग फिंगर की रिंग घुमाता रहता। कभी वॉच उतारकर टेबल पर रख देता, फिर पहन लेता। कभी नोट्स के बारे में पूछता, और एक दम से बोल पड़ा  — “Coffee क्या लोगी?”

जब हम दोनों आमने-सामने बैठे, हमने दो कोल्ड कॉफ़ी  की। मैंने सोचा जल्दी से कॉफ़ी खत्म करके निकलना होगा।

मैंने बिना साँस लिए बोलना शुरू कर दिया —
“मुझे नहीं पता आपको कौन से चैप्टर्स चाहिए… मैं सारे नोट्स लाई हूँ… ये RK Sir की एक्स्ट्रा क्लासेज वाले भी हैं… जो चाहिए ले लीजिए… और फिर मुझे निकलना चाहिए…”

वह बस मुझे देखता रहा।
फिर बोला, “तुम साँस लेकर बोलती हो या साँस रोककर?”

और इससे पहले कि मैं समझ पाती — वह हँस पड़ा।

हँसते वक़्त उसकी आँखें पहले मुस्कुराती थीं।

मैं झेंप गई। उसने हल्के से मुट्ठी बनाकर मेरे कंधे पर प्लेफुल सा पंच मारा और बोला, “I was just kidding. Chill.”

नोट्स देने और कॉफ़ी पीने के बाद मेरे पास बात करने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। मैं इधर-उधर देखने लगी… कहीं वह मेरे मन का चोर ना पकड़ ले। दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे खुद सुनाई दे रही थी।

थोड़ी देर वह नोट्स देखता रहा। जो चैप्टर्स चाहिए थे, उन्हें अलग पाइल में रखता गया।

फिर बोला, “तुम अपना फ़ोन नंबर दे दो… अगर कोई डाउट हुआ तो पूछ लूँगा।”

अब ये Mr. तो बहुत जल्दी फ्रैंक होते जा रहे थे।

दो दिन में कॉलेज गेट से CCD और CCD से घर के फ़ोन तक पहुँच गए थे हम।

आज की लैंग्वेज में कहूँ तो शायद मैं उसके “friendzone” में थी।

मैं थोड़ी हिचकिचाई… फिर लगा, फोन नंबर देने में क्या है।
और मैंने दे दिया — 60080।

उसने तुरंत कॉपी में लिख लिया।

मैंने उससे उसका नंबर माँगना ज़रूरी नहीं समझा… क्योंकि मैं क्यों ही फ़ोन करती उसे?

फिर मैं उठकर जाने लगी तो पर्स से कॉफ़ी के पैसे निकालने लगी। वह तुरंत चेयर से उठा, मेरे हाथ छूते हुए बोला —

“अब नोट्स भी तुम्हारे… और नोट भी तुम दोगी?”

मैं हँस पड़ी।


मैंने कहा, “मेरी CA माँ ने सिखाया है — clear accounts keep friendship clear.”

उसने बिना मौका गँवाए तुरंत पूछा, “तो… हम दोस्त हैं?”

मैं एकदम शर्मा गई।


फिर धीरे से बोली, “दोस्त नहीं होते तो नोट्स नहीं देती… नोट तो फिर भी दे देती।”

बस इतना सुनना था कि वह हँस पड़ा।
हँसते-हँसते बोला — “You are damn cute.”

कोई तो रोक लो… दिल की धड़कन फ़रारी से भी तेज़ भाग रहा था। और कहीं ना कहीं दिल जानता भी था कि यह सब शायद सिर्फ नोट्स के लिए है।

उस दिन कॉफ़ी के बाद मैं थोड़ी खुल सी गई। आज वाली बिंदास Garima कभी बहुत चुप और रिजर्व्ड हुआ करती थी — यह कोई नहीं मानेगा।

आज भी स्कूल और ग्रेजुएशन के दोस्त मिलते हैं तो बस यही कहते हैं —
“ज़रूर वक़्त ने किया है कोई हसीं सितम…”

मेरे कॉन्फिडेंस से लेकर ड्रेसिंग स्टाइल तक — सब 360 degree बदल गया।

जो लड़की हमेशा भीड़ का हिस्सा बनकर रहती थी… अब भीड़ में रहकर भी अपनी मौजूदगी महसूस करा देती है।

क्या इसका पूरा श्रेय मैं Raunak को देना चाहूँगी?

यह सोचते-सोचते सुबह हो गई। अलार्म में 6:30 बज रहे थे। Piku की वही धुन, जो आमतौर पर मेरे अंदर नई उत्साह से भर देती थी… आज मैं अलार्म बंद करके बस उन्हीं खयालों में रहना चाहती थी।

आज Raunak के अलावा कुछ और दिमाग में था ही नहीं।
ना ऑफिस की टेंशन… ना यह कि सारी प्रेस हुई या नहीं… ना Mrs. Bhatnagar की नई नाश्ता की रेसिपी।

कुछ नहीं।

बस… आज मैं थी।

वह था।

और कॉलेज के वो 5 साल।