Tuesday, May 12, 2026

Part 1 — The Phone Call (Present)

 भाग १


रात का सन्नाटा था, और अँधेरा इतना था कि हाथ को हाथ नहीं दिख रहा था,
तभी उस सन्नाटे में, ज़ोर की फ़ोन की घंटी बजी… ट्रिननन ट्रिननग… ट्रिंग्ग…

एकदम घबरा कर जब बिस्तर का स्विच ऑन किया और बत्ती खोल कर समय देखा तो कुछ 11:45 हुआ था… अब इतनी देर रात तक किसने फ़ोन किया… दिल ज़ोरों से धड़कने लगा, ना चाहते हुए… अजीब सी घबराहट थी।

अब इतनी देर रात को कोई खुशख़बरी कहाँ आती है, यह तो माँ हर बात पर बोलती है।

फिर एकदम से लगा, इस मोबाइल के ज़माने में लैंडलाइन पर कौन फ़ोन करता है।

जब तक भी फ़ोन की घंटी बजती जा रही थी, अब तक तो आईफ़ोन वॉइसमेल पर चला जाता… यह कम्बख़्त बजता ही जा रहा है…

अजीब कश्मकश में — उठ जा कर, फ़ोन का रिसीवर उठा कर… “हैलो” बोला और वहाँ से “हैलो” सुना… और यह हैलो मुझे सीधा 2006 में ले गया… पूरे 20 साल पीछे…

वह हैलो जाना-पहचाना तो था, पर अपना नहीं।

मैंने उस हैलो को सुनने के बाद — एक उधेड़बुन में थी, क्या वहाँ से कुछ सवाल आने दूँ कि ख़ुद पूछ डालूँ?

इससे पहले मैं कुछ समझ पाती, वहाँ से आया कि कैसी हो? मैं तुम्हारे शहर में हूँ… परसों ही आया जब एयरवेज़ खुला… गौरव से पता लगा कि तुम अब भी वहीं रहती हो और तुम्हारा नम्बर अब भी 60080 है…

मेरा तो मोबाइल नम्बर भी अभी वही है जो 18 साल पहले था… फिर भी लैंडलाइन पर ही क्यों?

मैं चुप थी, उस ख़ामोशी में मेरे कुछ ना पूछे सवाल, ना ज़ाहिर की हुई नाराज़गी, ना हक़ होते हुए भी हक़ दिखा रही थी…

हमेशा से हर बात के दो जवाब वाली मैं, हर बात में खिलखिलाने वाली मैं… आज एक बेचारी सी लड़की हो गई।

अपने सरकारी पद के इतने बड़े ओहदे पर होते हुए भी, जहाँ पचास लोग मुझको रिपोर्ट करते हैं… कैसे किसी की एक आवाज़ आपको एकदम चुप कर देती है।

अपने बिखरे हुए विचार और बेचैन मन को शांत करते हुए मैंने… आगे पूछा — कैसे हो?… कैसे हो?

उसका इतना सब बोलने का जवाब था “कैसे हो?” जैसे कि फ़ेसबुक अकाउंट से उसको देखना, नक़ली इंस्टाग्राम परिचय से उसको देखने के बाद भी कुछ कमी रह गई यह जानने की?

उसने फुर्ती से बोला जैसे सोच कर बैठा होगा — “अभी भी तुमको याद करता हूँ…”

हम्म्म… अभी भी मुझको याद करते हो… तो आज कैसे याद आई?

तक़रीबन इसी समय पर तुमने तो अमरीका जाने की सारी योजना कर ली थी आज से 15 साल पहले… अब किस तरक़्क़ी की याद… यह सब बोलना चाहती थी, पर दिल की कड़वाहट को होंठों पर लाना ज़रूरी नहीं… यह सोच कर मैंने बोला, अच्छा किया याद किया… और…

उसने बोला… और, तो बस क्या… आजकल दाढ़ी बढ़ गई है और बाल भी पोनी बना रखे हैं बिल्कुल अर्जुन रामपाल की तरह…क्या आज भी तुम्हारा फेवराइट है? 

मैं हँस पड़ी — यह सोच कर कि इसको तो पता नहीं, पर इसके प्रोफ़ाइल पर वह अंजलि सोलंकर तो मैं ही हूँ और चुपके से इसके सारे अपडेट्स पर नज़र रखे हूँ और पिछले महीने स्विट्ज़रलैंड वाली तस्वीर को मैं इतनी बार चूम चुकी थी कि मुझे लग रहा था फ़ोन की स्क्रीन ही ना टूट जाए… आज भी बात तो थी उसमें, किसी भी लड़की को अपना दीवाना बनाने की, तभी तो Sherlin नाम की लड़की इसकी हर तस्वीर में चिपकी रहती है इसके साथ।

यह सोच कर कि वह चुभन जब पहली बार उन दोनों की तस्वीर देख कर हुई थी, आज फिर हो गई।

उस हँसी के साथ, मैं चुप हो गई…

उसने बोला — आज भी तुम्हारी हसी उतनी ही खूबसूरत है।

मैंने बोला — हाँ, पर मेरे बाल तो अब सफ़ेद हो गए… लड़कियाँ (मन में सोचते हुए — जिनका दिल टूट जाता है) वोह वक़्त से ज़्यादा जल्दी बड़े हो जाते हैं।

उसने कहा — क्या मैडम, आज भी तुलना करती हो? बिल्कुल वही उत्तर प्रदेश वाला लहजा जैसे वह पहले बोला करता था।

मैंने बोला — 15 साल अमरीका में रहने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ… वही के वही यूपी वाला अंदाज़ …

अब हँसने की बारी उसकी थी, वह ज़ोर से हँसा और बोला — शहर बदला है, दिल नहीं।

घड़ी के काँटे 12:30 हो चुके… आधे घंटे से हम दोनों बात कर रहे हैं पर अभी तक समझ नहीं आया कि इस समय फ़ोन करने का मतलब?

मैं बात आगे और नहीं खींचना चाहती थी, इसलिए मैंने कहा — अभी बहुत रात हो चुकी है, कल बात करते हैं… तुम मुझे अपना नम्बर दे दो… मैं तुम्हें व्हॉट्सऐप कर दूँगी…

उसने मेरी यह बात अनसुनी करते हुए बोला — मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ…

मैं घबरा गई, जाड़ों की ठंड में पसीना आने लगा, सिर भारी हो गया, दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि वह सुन सकता था शायद… धक… धक… धक…

क्या बोलूँ मैं इसको? क्या कहूँ, नहीं मुझे नहीं मिलना, नहीं मैं नहीं मिल सकती… कल बहुत काम है…

और यह सब सोचते-सोचते — एकदम से निकला… कब?

उसने भी देर ना लगाते हुए बोला — आज, अभी, इसी वक़्त…

मैं घबरा गई… फ़टाफट फ़ोन को उठा कर तार लंबी करते हुए, खिड़की की तरफ़ गई — देखने के लिए कहीं वह घर के बाहर तो नहीं…

एक काले अँधेरे साए के अलावा कुछ नहीं… और जब गहरी साँस ली, जिसे शायद वह सुन सकता था…

वह हँसा… बोला — नहीं, तुम्हारी खिड़की पर आना छोड़ दिया है अब मैंने।

और यह बात कुछ टीस सी चुभ गई और मैंने बोला —
छोड़ा तो तुमने पता नहीं क्या-क्या है…

और फिर हम दोनों चुप हो गए, घड़ी के काँटे अब एक बजा चुके थे… मुझे सुबह जल्दी उठना था… अब तो यह बात मुझे सोने भी नहीं देगी।

मन तो चाह रहा है बातें करूँ, लड़ूँ, हँसू, या क्या-क्या बोलूँ… पर शब्दों के भी कोई मायने हैं भला… इन सब बातों को जो मैं 15 साल से नहीं बोल पाई, अब वह क्या कह पाती।

मैंने उसको बोला — अब हमें फ़ोन रख देना चाहिए… बहुत देर हो चुकी है…

उसने बोला — हाँ, देर तो काफ़ी हो चुकी…

यह सुनते ही दोनों तरफ़ से सुबकने की आवाज़ आई… कि दोनों ने ही अपने आँसू शायद गिरने से पहले ही पोंछ दिए…

क्या दिल टूटने में ऐसा दर्द महसूस होता है क्या… मेरी दिल की धड़कनें बढ़ गईं, अपनी iwatch पर heartrate देखा तो उसने भी सिग्नल दिया कि “तुम्हारा हृदय असामान्य रूप से व्यवहार कर रहा है…”

एक बार फिर से बिना विदा बोले, हम दोनों ने फ़ोन रख दिया…

अब जैसा सोचा था, वही हुआ… नींद कोसों दूर थी, अब ना सुबह जल्दी उठने का मन था और ना कार्यालय जाने की इच्छा…

इस एक घंटे के फ़ोन ने मुझे फिर से 20 साल पीछे भेज दिया था।

और समझ नहीं आ रहा था कहाँ से शुरू और कहाँ ख़त्म होगी यह रात।


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