Tuesday, May 12, 2026

Part 2 - 60080

कॉलेज का पहला दिन था और हमेशा की तरह मैं बेपरवाह सी कंप्यूटर लैब की सीढ़ियाँ उतर रही थी। कब मेरा दुपट्टा पैरों में फँसा और मैं उस कंप्यूटर लैब से, जो 2nd floor पर थी… जहाँ से करीब 35-40 सीढ़ियाँ नीचे आती थीं… पूरे कॉलेज के बीचों-बीच लुढ़कती हुई पहुँच गई - पता ही नहीं चला। मेरी सारी सहेलियाँ हँस रही थीं, तभी एक हाथ आगे बढ़ा… उसने मुझे उठाया और पूछा, “Are you okay?”

मैं एकदम सन्न रह गई। इतना हैंडसम लड़का मुझसे बात कर रहा है - यह ही बहुत था… हाथ पकड़ना तो बहुत दूर की बात थी। कोई चोट नहीं लगी थी, बस पैर हल्की मोच आई थी । उसने मुझे सहारा दिया, अपने हाथों से उठाया और पास की बेंच पर बैठा दिया। फिर मेरी फ्रेंड्स की तरफ देखकर बोला, “Guys, she is really hurt.”

फिर क्या था… वह कभी कैंटीन में, कभी कॉरिडोर में, कभी क्लासेज के बाहर दिख जाता। कौन से ईयर में था, कौन सी स्ट्रीम में पढ़ता था — कुछ नहीं पता था। इतना अंडरकॉन्फ़ाइड थी कि उसका नाम तक ना उससे पूछ पाई, ना किसी और से।

बस इतना पता था कि जब भी आसपास होता… एहसास हो जाता। हमारी नज़रें मिलतीं और मैं तुरंत ऐसे मुँह फेर लेती जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो।

उस वक़्त मैं बिल्कुल साधारण सी रहती थी। आज के ज़माने में शायद उस वाली Garima को “behanji” बोल देते। मेक अप के नाम पर आँखों में काजल, एक लिप  बाम जिसे थोड़ा ब्लश की तरह इस्तेमाल कर लिया… सूट पहनती थी, दुपट्टा लेकर… और फ्लैट्स चप्पल। वैसे भी इतना गिरने का रिकॉर्ड था कि माँ पापा  ने हील्स पहनने से सख़्त मना किया हुआ था।

एक दिन ऑटो में बैठकर जब मैं घर लौट रही थी, उसने भी ऑटो रुकवाया और आकर मेरे साथ बैठ गया। इस रूट पर उसे पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए बड़ा अजीब लगा… और दिल की धड़कन तो जैसे कंट्रोल से बाहर थी।

बॉलीवुड का कीड़ा तो था ही… मुझे पूरा यक़ीन था कि अब वह बोलेगा — “मुझे तुम्हारी दोस्त Kalpana पसंद है… क्या तुम उसके लिए यह चिट्टी दे दोगी?” या “मेरी उससे बात करवा दोगी?”


ऐसे कम से कम हज़ार Permutation and Combination बना चुकी थी मैं। आखिर मैथ्स टॉपर जो थी।

थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद उसने कहा, “Hi, Garima.”

मैं चौंक पड़ी। उसे मेरा नाम पता है?

मैंने कहा, “Oh… hii?” — जैसे सवाल पूछ रही हूँ।

उसे समझ आ गया कि आज तक हमारा प्राइपर इंट्रोडक्शन हुआ ही नहीं था।

उसने हाथ बढ़ाते हुए कहा, “Hi, I am Raunak.”

मैंने भी पूरी जोश के साथ ज़ोर से हैंडशेक कर लिया। वह हँस पड़ा और बोला, “Manly handshake.”

और मैं वहीं सफेद पड़ गई।

इस छोटे से इंट्रो के बाद उसने कहा, “I need your help.”

बस… अब मुझे समझ आ गया था कि मुझसे बात क्यों हो रही है। मैंने तुरंत मुँह बना लिया।

वह हँसकर बोला, “अरे ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे बस आपके Differential Equations के नोट्स चाहिए। RK सर कह रहे थे कि अगर सबसे अच्छे नोट्स कोई  बनाता है तो वो Garima है। कई दिनों से सोच रहा था आपसे कैसे मिलूँ।”

फिर बोला, “Actually I’m preparing for GMAT… तो जितनी मदद मिल जाए।”

मैंने लंबी सी राहत की साँस ली।
Kalpana तो इसके ख़याल में भी नहीं है। यह तो सच में  पढ़ाकू निकला।

मेरा इम्प्रैशन लेवल अब 100 के पार था।

Looks — 10/10, Name — 20/10 or पढ़ाई वाला लड़का — 100/10

इससे पहले कि वह मेरी दिल की धड़कन सुन लेता, मैंने जल्दी से कहा, “कल ले आऊँगी… आप कॉलेज के गेट पर 12 बजे ले लेना, नहीं तो गार्ड भैया को दे दूँगी।”

वह मुस्कुराया और बोला, “आप पोस्ट क्यों नहीं कर देतीं? हम कॉलेज के बाद साथ वाले CCD में मिल सकते हैं… वहीं दे दीजिएगा। अगर आपके घर में कोई प्रॉव्लम  नहीं है।”

अब मैं कोई दकियानूसी सोच वाले घर से तो थी नहीं। मेरे पैरेंट्स की खुद 80s में लव मैरिज हुई थी।

अगले दिन मैं क्लासेज खत्म करके ठीक 3 बजे CCD पहुँच गई।

मैंने अपना फेवरेट पीला चिकनकारी सूट पहना था, साथ में सफेद चूड़ीदारी और सफेद दुपट्टा । आज थोड़ा अच्छा लगने के लिए झुमके और छोटी सी बिंदी भी लगा ली थी। सुबह तैयार होते वक़्त माँ बार-बार पूछ रही थीं, “आज क्या खास है?”


और मैं बस यही बोल रही थी, “अरे यार, इंसान अच्छे से तैयार भी नहीं हो सकता क्या?”

सुबह से दोपहर तक खुद को हज़ार बार देख चुकी थी। जहाँ भी कोई रिफ़्लेक्शिय दिख जाता — चाहे ऑटो का शीशा हो, गार्ड रूम का दीवार का शीशा जिसमें गार्ड भैया  बाल बनाते थे… चाहे क्लासरूम्स की खिड़कियां… जहाँ-जहाँ भी रिफ़्लेक्शन पड़ रही थी… साइंस के हिसाब से वहाँ तक पहुँचने वाली रोशनी मेरी ही थी।

किसी के आने से पहले कभी एहसास नहीं हुआ था कि किसी की मौजूदगी भी शोर कर सकती है।

ठीक पाँच मिनट बाद — Raunak।
वाइट शर्ट, ब्लू जीन्स, ब्लू कैनवास शूज़, टक्ड इन शर्ट, सिल्वर चैन वॉच एंड ओल्ड स्पाइस जैसी ख़ुश्बू ।

वह जहाँ खड़ा होता था, वहाँ बाकी आवाज़ें धीमी लगने लगती थीं।
वह भीड़ में अलग दिखने की कोशिश नहीं करता था… फिर भी सबसे अलग लगता था।

उसमें ऐसी कोई एक्स्ट्राऑर्डिनरी बात नहीं थी कि फुटबॉल टीम कैप्टेन हो या डिबेट चैंपियन । बिल्कुल नार्मल लड़का था। 80-90% वाला। उसने भी मेरी तरह हर चीज़ में एनरोल किया हुआ था — computer basics, Java, dramatics, cultural team…

उसे भी नेता बनने का शौक नहीं था… लेकिन जब वह बोलता था, स्टूडेंट्स क्या, टीचर्स  भी उसकी बात सुनते थे।

अब वह सामने आकर बैठ गया। उससे नज़र मिलाना आसान नहीं था… और नज़र हटाना उससे भी मुश्किल।

बात करते-करते वह अपने बाई हाथ से दाई हाथ की रिंग फिंगर की रिंग घुमाता रहता। कभी वॉच उतारकर टेबल पर रख देता, फिर पहन लेता। कभी नोट्स के बारे में पूछता, और एक दम से बोल पड़ा  — “Coffee क्या लोगी?”

जब हम दोनों आमने-सामने बैठे, हमने दो कोल्ड कॉफ़ी  की। मैंने सोचा जल्दी से कॉफ़ी खत्म करके निकलना होगा।

मैंने बिना साँस लिए बोलना शुरू कर दिया —
“मुझे नहीं पता आपको कौन से चैप्टर्स चाहिए… मैं सारे नोट्स लाई हूँ… ये RK Sir की एक्स्ट्रा क्लासेज वाले भी हैं… जो चाहिए ले लीजिए… और फिर मुझे निकलना चाहिए…”

वह बस मुझे देखता रहा।
फिर बोला, “तुम साँस लेकर बोलती हो या साँस रोककर?”

और इससे पहले कि मैं समझ पाती — वह हँस पड़ा।

हँसते वक़्त उसकी आँखें पहले मुस्कुराती थीं।

मैं झेंप गई। उसने हल्के से मुट्ठी बनाकर मेरे कंधे पर प्लेफुल सा पंच मारा और बोला, “I was just kidding. Chill.”

नोट्स देने और कॉफ़ी पीने के बाद मेरे पास बात करने के लिए कुछ बचा ही नहीं था। मैं इधर-उधर देखने लगी… कहीं वह मेरे मन का चोर ना पकड़ ले। दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि मुझे खुद सुनाई दे रही थी।

थोड़ी देर वह नोट्स देखता रहा। जो चैप्टर्स चाहिए थे, उन्हें अलग पाइल में रखता गया।

फिर बोला, “तुम अपना फ़ोन नंबर दे दो… अगर कोई डाउट हुआ तो पूछ लूँगा।”

अब ये Mr. तो बहुत जल्दी फ्रैंक होते जा रहे थे।

दो दिन में कॉलेज गेट से CCD और CCD से घर के फ़ोन तक पहुँच गए थे हम।

आज की लैंग्वेज में कहूँ तो शायद मैं उसके “friendzone” में थी।

मैं थोड़ी हिचकिचाई… फिर लगा, फोन नंबर देने में क्या है।
और मैंने दे दिया — 60080।


उसने तुरंत कॉपी में लिख लिया।
मैंने उससे उसका नंबर माँगना ज़रूरी नहीं समझा… क्योंकि मैं क्यों ही फ़ोन करती उसे?

फिर मैं उठकर जाने लगी तो पर्स से कॉफ़ी के पैसे निकालने लगी। वह तुरंत चेयर से उठा, मेरे हाथ छूते हुए बोला —

“अब नोट्स भी तुम्हारे… और नोट भी तुम दोगी?”

मैं हँस पड़ी।
मैंने कहा, “मेरी CA माँ ने सिखाया है — clear accounts keep friendship clear.”

उसने बिना मौका गँवाए तुरंत पूछा, “तो… हम दोस्त हैं?”

मैं एकदम शर्मा गई।
फिर धीरे से बोली, “दोस्त नहीं होते तो नोट्स नहीं देती… नोट तो फिर भी दे देती।”

बस इतना सुनना था कि वह हँस पड़ा।
हँसते-हँसते बोला — “You are damn cute.”

कोई तो रोक लो… दिल की धड़कन फ़रारी से भी तेज़ भाग रहा था। और कहीं ना कहीं दिल जानता भी था कि यह सब शायद सिर्फ नोट्स के लिए है।

उस दिन कॉफ़ी के बाद मैं थोड़ी खुल सी गई। आज वाली बिंदास Garima कभी बहुत चुप और रिजर्व्ड हुआ करती थी — यह कोई नहीं मानेगा।

आज भी स्कूल और ग्रेजुएशन के दोस्त मिलते हैं तो बस यही कहते हैं —
“ज़रूर वक़्त ने किया है कोई हसीं सितम…”

मेरे कॉन्फिडेंस से लेकर ड्रेसिंग स्टाइल तक — सब 360 degree बदल गया।

जो लड़की हमेशा भीड़ का हिस्सा बनकर रहती थी… अब भीड़ में रहकर भी अपनी मौजूदगी महसूस करा देती है।

क्या इसका पूरा श्रेय मैं Raunak को देना चाहूँगी?

यह सोचते-सोचते सुबह हो गई। अलार्म में 6:30 बज रहे थे। Piku की वही धुन, जो आमतौर पर मेरे अंदर नई उत्साह से भर देती थी… आज मैं अलार्म बंद करके बस उन्हीं खयालों में रहना चाहती थी।

आज Raunak के अलावा कुछ और दिमाग में था ही नहीं।
ना ऑफिस की टेंशन… ना यह कि सारी प्रेस हुई या नहीं… ना Mrs. Bhatnagar की नई नाश्ता की रेसिपी।

कुछ नहीं।

बस… आज मैं थी।

वह था।
और कॉलेज के वो 3 साल।


Part 1 — The Phone Call (Present)

 भाग १


रात का सन्नाटा था, और अँधेरा इतना था कि हाथ को हाथ नहीं दिख रहा था,
तभी उस सन्नाटे में, ज़ोर की फ़ोन की घंटी बजी… ट्रिननन ट्रिननग… ट्रिंग्ग…

एकदम घबरा कर जब बिस्तर का स्विच ऑन किया और बत्ती खोल कर समय देखा तो कुछ 11:45 हुआ था… अब इतनी देर रात तक किसने फ़ोन किया… दिल ज़ोरों से धड़कने लगा, ना चाहते हुए… अजीब सी घबराहट थी।

अब इतनी देर रात को कोई खुशख़बरी कहाँ आती है, यह तो माँ हर बात पर बोलती है।

फिर एकदम से लगा, इस मोबाइल के ज़माने में लैंडलाइन पर कौन फ़ोन करता है।

जब तक भी फ़ोन की घंटी बजती जा रही थी, अब तक तो आईफ़ोन वॉइसमेल पर चला जाता… यह कम्बख़्त बजता ही जा रहा है…

अजीब कश्मकश में — उठ जा कर, फ़ोन का रिसीवर उठा कर… “हैलो” बोला और वहाँ से “हैलो” सुना… और यह हैलो मुझे सीधा 2006 में ले गया… पूरे 20 साल पीछे…

वह हैलो जाना-पहचाना तो था, पर अपना नहीं।

मैंने उस हैलो को सुनने के बाद — एक उधेड़बुन में थी, क्या वहाँ से कुछ सवाल आने दूँ कि ख़ुद पूछ डालूँ?

इससे पहले मैं कुछ समझ पाती, वहाँ से आया कि कैसी हो? मैं तुम्हारे शहर में हूँ… परसों ही आया जब एयरवेज़ खुला… गौरव से पता लगा कि तुम अब भी वहीं रहती हो और तुम्हारा नम्बर अब भी 60080 है…

मेरा तो मोबाइल नम्बर भी अभी वही है जो 18 साल पहले था… फिर भी लैंडलाइन पर ही क्यों?

मैं चुप थी, उस ख़ामोशी में मेरे कुछ ना पूछे सवाल, ना ज़ाहिर की हुई नाराज़गी, ना हक़ होते हुए भी हक़ दिखा रही थी…

हमेशा से हर बात के दो जवाब वाली मैं, हर बात में खिलखिलाने वाली मैं… आज एक बेचारी सी लड़की हो गई।

अपने सरकारी पद के इतने बड़े ओहदे पर होते हुए भी, जहाँ पचास लोग मुझको रिपोर्ट करते हैं… कैसे किसी की एक आवाज़ आपको एकदम चुप कर देती है।

अपने बिखरे हुए विचार और बेचैन मन को शांत करते हुए मैंने… आगे पूछा — कैसे हो?… कैसे हो?

उसका इतना सब बोलने का जवाब था “कैसे हो?” जैसे कि फ़ेसबुक अकाउंट से उसको देखना, नक़ली इंस्टाग्राम परिचय से उसको देखने के बाद भी कुछ कमी रह गई यह जानने की?

उसने फुर्ती से बोला जैसे सोच कर बैठा होगा — “अभी भी तुमको याद करता हूँ…”

हम्म्म… अभी भी मुझको याद करते हो… तो आज कैसे याद आई?

तक़रीबन इसी समय पर तुमने तो अमरीका जाने की सारी योजना कर ली थी आज से 15 साल पहले… अब किस तरक़्क़ी की याद… यह सब बोलना चाहती थी, पर दिल की कड़वाहट को होंठों पर लाना ज़रूरी नहीं… यह सोच कर मैंने बोला, अच्छा किया याद किया… और…

उसने बोला… और, तो बस क्या… आजकल दाढ़ी बढ़ गई है और बाल भी पोनी बना रखे हैं बिल्कुल अर्जुन रामपाल की तरह…क्या आज भी तुम्हारा फेवराइट है? 

मैं हँस पड़ी — यह सोच कर कि इसको तो पता नहीं, पर इसके प्रोफ़ाइल पर वह अंजलि सोलंकर तो मैं ही हूँ और चुपके से इसके सारे अपडेट्स पर नज़र रखे हूँ और पिछले महीने स्विट्ज़रलैंड वाली तस्वीर को मैं इतनी बार चूम चुकी थी कि मुझे लग रहा था फ़ोन की स्क्रीन ही ना टूट जाए… आज भी बात तो थी उसमें, किसी भी लड़की को अपना दीवाना बनाने की, तभी तो Sherlin नाम की लड़की इसकी हर तस्वीर में चिपकी रहती है इसके साथ।

यह सोच कर कि वह चुभन जब पहली बार उन दोनों की तस्वीर देख कर हुई थी, आज फिर हो गई।

उस हँसी के साथ, मैं चुप हो गई…

उसने बोला — आज भी तुम्हारी हसी उतनी ही खूबसूरत है।

मैंने बोला — हाँ, पर मेरे बाल तो अब सफ़ेद हो गए… लड़कियाँ (मन में सोचते हुए — जिनका दिल टूट जाता है) वोह वक़्त से ज़्यादा जल्दी बड़े हो जाते हैं।

उसने कहा — क्या मैडम, आज भी तुलना करती हो? बिल्कुल वही उत्तर प्रदेश वाला लहजा जैसे वह पहले बोला करता था।

मैंने बोला — 15 साल अमरीका में रहने का कोई फ़ायदा नहीं हुआ… वही के वही यूपी वाला अंदाज़ …

अब हँसने की बारी उसकी थी, वह ज़ोर से हँसा और बोला — शहर बदला है, दिल नहीं।

घड़ी के काँटे 12:30 हो चुके… आधे घंटे से हम दोनों बात कर रहे हैं पर अभी तक समझ नहीं आया कि इस समय फ़ोन करने का मतलब?

मैं बात आगे और नहीं खींचना चाहती थी, इसलिए मैंने कहा — अभी बहुत रात हो चुकी है, कल बात करते हैं… तुम मुझे अपना नम्बर दे दो… मैं तुम्हें व्हॉट्सऐप कर दूँगी…

उसने मेरी यह बात अनसुनी करते हुए बोला — मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ…

मैं घबरा गई, जाड़ों की ठंड में पसीना आने लगा, सिर भारी हो गया, दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि वह सुन सकता था शायद… धक… धक… धक…

क्या बोलूँ मैं इसको? क्या कहूँ, नहीं मुझे नहीं मिलना, नहीं मैं नहीं मिल सकती… कल बहुत काम है…

और यह सब सोचते-सोचते — एकदम से निकला… कब?

उसने भी देर ना लगाते हुए बोला — आज, अभी, इसी वक़्त…

मैं घबरा गई… फ़टाफट फ़ोन को उठा कर तार लंबी करते हुए, खिड़की की तरफ़ गई — देखने के लिए कहीं वह घर के बाहर तो नहीं…

एक काले अँधेरे साए के अलावा कुछ नहीं… और जब गहरी साँस ली, जिसे शायद वह सुन सकता था…

वह हँसा… बोला — नहीं, तुम्हारी खिड़की पर आना छोड़ दिया है अब मैंने।

और यह बात कुछ टीस सी चुभ गई और मैंने बोला —
छोड़ा तो तुमने पता नहीं क्या-क्या है…

और फिर हम दोनों चुप हो गए, घड़ी के काँटे अब एक बजा चुके थे… मुझे सुबह जल्दी उठना था… अब तो यह बात मुझे सोने भी नहीं देगी।

मन तो चाह रहा है बातें करूँ, लड़ूँ, हँसू, या क्या-क्या बोलूँ… पर शब्दों के भी कोई मायने हैं भला… इन सब बातों को जो मैं 15 साल से नहीं बोल पाई, अब वह क्या कह पाती।

मैंने उसको बोला — अब हमें फ़ोन रख देना चाहिए… बहुत देर हो चुकी है…

उसने बोला — हाँ, देर तो काफ़ी हो चुकी…

यह सुनते ही दोनों तरफ़ से सुबकने की आवाज़ आई… कि दोनों ने ही अपने आँसू शायद गिरने से पहले ही पोंछ दिए…

क्या दिल टूटने में ऐसा दर्द महसूस होता है क्या… मेरी दिल की धड़कनें बढ़ गईं, अपनी iwatch पर heartrate देखा तो उसने भी सिग्नल दिया कि “तुम्हारा हृदय असामान्य रूप से व्यवहार कर रहा है…”

एक बार फिर से बिना विदा बोले, हम दोनों ने फ़ोन रख दिया…

अब जैसा सोचा था, वही हुआ… नींद कोसों दूर थी, अब ना सुबह जल्दी उठने का मन था और ना कार्यालय जाने की इच्छा…

इस एक घंटे के फ़ोन ने मुझे फिर से 20 साल पीछे भेज दिया था।

और समझ नहीं आ रहा था कहाँ से शुरू और कहाँ ख़त्म होगी यह रात।